अमरीश पुरी ने एक्टर बनने के लिए बहुत संघर्ष किया था। ये बात तो सभी जानते हैं कि अमरीश पुरी किसी ज़माने में फिल्मों में हीरो बनने का ख्वाब देखते थे। लेकिन उनकी किस्मत में हीरो नहीं, आईकॉनिक विलेन बनना लिखा था। इसलिए वो विलेन ही बने। लेकिन विलेन बनने से पहले उन्हें भी फिल्म इंडस्ट्री के कड़े इम्तिहान से गुज़रना पड़ा था। और उस इम्तिहान में इनकी पत्नी उर्मिला दिवेकर जी ने इनका बड़ा साथ दिया।वो हमेशा कहते थे,”मैं हीरो बनूं या ना बनूं। लेकिन इस घर की हीरो तो मेरी पत्नी ही है।”
अमरीश पुरी की प्यारी सी प्रेम कहानी। उन दिनों अमरीश पुरी बीमा कंपनी में नौकरी कर रहे थे। अमरीश पुरी वहां क्लर्क थे। उर्मिला दिवेकर भी उसी इंश्योरेंस कंपी में कार्यरत थी। जब अमरीश पुरी ने उर्मिला दिवेकर जी को पहली दफा देखा तो वो उन्हें देखते ही रह गए। वो उर्मिला जी की सादगी के कायल हो गए थे। ये वो ज़माना था जब अमरीश पुरी नौकरी के साथ-साथ थिएटर भी किया करते थे। धीरे-धीरे उर्मिला जी और अमरीश पुरी जी की जान-पहचान बढ़ी। दोनों ने एक-दूजे को समझना शुरू किया। उर्मिला जी ने तो कभी थिएटर नहीं किया। लेकिन अमरीश पुरी को थिएटर करते देखना उन्हें अच्छा लगता था। दोनों थिएटर के बारे में और एक-दूजे की पसंद-नापसंद के बारे में भी बातें करते थे।
धीरे-धीरे दोनों एक-दूजे को पसंद करने लगे। दोनों के मन में प्यार का अंकुर फूट चुका था। आखिरकार एक दिन दोनों ने स्वीकार कर लिया कि वो आपस में इश्क करने लगे हैं। अब यहां तक तो कहानी एकदम सरल चल रही थी। लेकिन असली ट्विस्ट आया इसके बाद। उर्मिला दिवेकर थी दक्षिण भारतीय। जबकी अमरीश पुरी थे पंजाबी। इसलिए जब इन दोनों के घरवालों को पता चला कि ये शादी करना चाहते हैं, तो वो खुश नहीं हुए। क्योंकि दोनों का कल्चर एकदम डिफरेंट। लेकिन वो कहते हैं ना कि मियां बीवी राज़ी तो क्या करेगा काज़ी। दोनों ने अपने-अपने घरवालों को यकीन दिलाया कि ये शादी करके खुश रहेंगे और जीवन में शादी की तरफ से कोई परेशानी कभी नहीं आएगी। आखिरकार दोनों के घरवाले मान गए। और आखिरकार 05 जनवरी 1957 को दोनों जन्म-जन्मांतर के बंधन में बंध गए।
जब कामयाबी ने इनके कदम चूमे और इन्होंने अपना एक बंगला मुंबई में बनाया तो उस बंगले को अपनी पत्नी को समर्पित किया।

