भूपेश बघेल को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका: पाटन विधानसभा चुनाव को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई जारी रहेगी

छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को 2023 पाटन विधानसभा चुनाव मामले में सुप्रीम कोर्ट से राहत नहीं मिली। सर्वोच्च न्यायालय ने चुनाव याचिका समाप्त करने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी। जानिए पूरा मामला, कोर्ट की टिप्पणी, चुनाव याचिका के आरोप और आगे की कानूनी प्रक्रिया।

रायपुर/नई दिल्ली CHHATTISHGARH (प्रखर न्यूज 24) छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री एवं पाटन विधानसभा क्षेत्र से कांग्रेस विधायक भूपेश बघेल को वर्ष 2023 के विधानसभा चुनाव से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट से महत्वपूर्ण झटका लगा है। सर्वोच्च न्यायालय ने उनकी उस याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें उन्होंने अपने निर्वाचन को चुनौती देने वाली चुनाव याचिका को प्रारंभिक स्तर पर ही समाप्त करने का आग्रह किया था। हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि मुख्य चुनाव याचिका की सुनवाई के दौरान भूपेश बघेल अपने सभी कानूनी और तथ्यात्मक तर्क रखने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र रहेंगे।

इस आदेश के साथ अब पाटन विधानसभा चुनाव से जुड़ी मूल चुनाव याचिका पर आगे की सुनवाई का रास्ता साफ हो गया है। राजनीतिक और कानूनी दोनों दृष्टि से यह मामला आने वाले समय में छत्तीसगढ़ की राजनीति के लिए अहम माना जा रहा है।

क्या है पूरा मामला?

वर्ष 2023 के छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव में पाटन सीट से कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और तत्कालीन मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने जीत दर्ज की थी। उनके खिलाफ भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार विजय बघेल मैदान में थे।

चुनाव परिणाम के बाद विजय बघेल ने भूपेश बघेल के निर्वाचन को चुनौती देते हुए चुनाव याचिका दायर की। याचिका में आरोप लगाया गया कि मतदान से ठीक पहले लागू होने वाले 48 घंटे के मौन काल (Silence Period) के दौरान भूपेश बघेल ने रोड शो किया, जो जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 के प्रावधानों का उल्लंघन है।

याचिकाकर्ता का कहना है कि चुनाव प्रचार पर प्रतिबंध लागू होने के बावजूद सार्वजनिक राजनीतिक गतिविधि आयोजित की गई, जिससे चुनावी प्रक्रिया प्रभावित हुई।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय पीठ, जिसमें मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना शामिल थे, ने मामले की सुनवाई की।

पीठ ने भूपेश बघेल की उस याचिका को स्वीकार करने से इनकार कर दिया, जिसमें उन्होंने चुनाव याचिका को प्रारंभिक स्तर पर ही समाप्त करने की मांग की थी।

हालांकि सर्वोच्च न्यायालय ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया कि चुनाव याचिका की सुनवाई के दौरान भूपेश बघेल अपने सभी कानूनी, संवैधानिक और तथ्यात्मक तर्क रखने के लिए स्वतंत्र होंगे। इसका अर्थ यह है कि अदालत ने अभी चुनाव याचिका में लगाए गए आरोपों पर कोई अंतिम राय व्यक्त नहीं की है।

भूपेश बघेल की ओर से क्या दलील दी गई?

भूपेश बघेल की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने अदालत में पक्ष रखा। उन्होंने दलील दी कि यदि याचिका में लगाए गए आरोपों को सही मान भी लिया जाए, तब भी यह अधिकतम जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 126 के तहत चुनाव संबंधी अपराध हो सकता है।

उन्होंने कहा कि इस कथित घटना को धारा 123 के तहत “भ्रष्ट आचरण (Corrupt Practice)” नहीं माना जा सकता, जो किसी चुनाव को निरस्त करने का आधार बनती है।

बचाव पक्ष का तर्क था कि चुनाव याचिका में लगाए गए आरोप चुनाव परिणाम को अमान्य घोषित करने के लिए पर्याप्त कानूनी आधार प्रस्तुत नहीं करते।

चुनाव याचिका में क्या आरोप हैं?

याचिकाकर्ता विजय बघेल ने आरोप लगाया है कि—

  • मतदान से 48 घंटे पहले लागू चुनावी मौन अवधि के दौरान रोड शो आयोजित किया गया।
  • इससे चुनाव आयोग के दिशा-निर्देशों और जनप्रतिनिधित्व अधिनियम के प्रावधानों का उल्लंघन हुआ।
  • इस कथित उल्लंघन को चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित करने वाला कृत्य माना जाना चाहिए।

इन आरोपों के आधार पर पाटन विधानसभा चुनाव परिणाम को चुनौती दी गई है।

धारा 126 और धारा 123 में क्या अंतर है?

इस मामले का सबसे महत्वपूर्ण कानूनी पहलू यही है कि क्या कथित रोड शो केवल धारा 126 का उल्लंघन है या इसे धारा 123 के तहत “भ्रष्ट आचरण” भी माना जा सकता है।

  • धारा 126 चुनाव प्रचार पर मतदान से 48 घंटे पहले प्रतिबंध लगाने का प्रावधान करती है। इसका उद्देश्य मतदाताओं को शांत वातावरण में निर्णय लेने का अवसर देना है।
  • धारा 123 उन कार्यों की सूची निर्धारित करती है जिन्हें चुनावी भ्रष्ट आचरण माना जाता है। यदि किसी उम्मीदवार का आचरण इस श्रेणी में आता है और अदालत इसे सिद्ध मानती है, तो चुनाव परिणाम प्रभावित हो सकता है।

यही कानूनी प्रश्न आगे की सुनवाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

अब आगे क्या होगा?

सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश के बाद चुनाव याचिका पर नियमित सुनवाई जारी रहेगी। अब संबंधित अदालत में दोनों पक्ष अपने-अपने साक्ष्य, दस्तावेज और कानूनी तर्क प्रस्तुत करेंगे।

इस चरण में अदालत यह तय करेगी कि याचिका में लगाए गए आरोप तथ्यों और कानून की कसौटी पर कितने मजबूत हैं। अंतिम निर्णय आने तक भूपेश बघेल पाटन विधानसभा क्षेत्र के निर्वाचित विधायक बने रहेंगे।

राजनीतिक मायने भी अहम

भूपेश बघेल छत्तीसगढ़ कांग्रेस के प्रमुख नेताओं में गिने जाते हैं। ऐसे में उनके निर्वाचन से जुड़ा मामला राजनीतिक रूप से भी काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। दूसरी ओर भाजपा की ओर से दायर चुनाव याचिका को लेकर भी प्रदेश की राजनीति में लगातार चर्चा बनी हुई है।

हालांकि सुप्रीम कोर्ट के ताजा आदेश को चुनाव परिणाम पर अंतिम फैसला नहीं माना जा सकता। अदालत ने केवल इतना कहा है कि चुनाव याचिका को प्रारंभिक स्तर पर समाप्त नहीं किया जा सकता और इसकी विधिवत सुनवाई होगी।

कानूनी प्रक्रिया पर रहेगी नजर

विशेषज्ञों का मानना है कि चुनावी मामलों में अदालतें आमतौर पर तथ्यों, साक्ष्यों और संबंधित कानूनी प्रावधानों का विस्तृत परीक्षण करती हैं। ऐसे मामलों में प्रारंभिक याचिका खारिज होने का अर्थ यह नहीं होता कि किसी पक्ष के आरोप या बचाव को अंतिम रूप से स्वीकार या अस्वीकार कर दिया गया है।

इसलिए आने वाले समय में इस मामले की सुनवाई और अदालत की टिप्पणियों पर राजनीतिक दलों के साथ-साथ कानूनी विशेषज्ञों की भी नजर रहेगी।

सुप्रीम कोर्ट के ताजा आदेश से यह स्पष्ट हो गया है कि पाटन विधानसभा चुनाव को चुनौती देने वाली याचिका पर अब नियमित सुनवाई जारी रहेगी। भूपेश बघेल को फिलहाल चुनाव याचिका समाप्त कराने में सफलता नहीं मिली है, लेकिन उन्हें अपने सभी कानूनी और तथ्यात्मक पक्ष रखने का पूरा अवसर मिलेगा। वहीं याचिकाकर्ता विजय बघेल को भी अपने आरोपों को अदालत में सिद्ध करना होगा। अंतिम निर्णय विस्तृत सुनवाई और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ही होगा।


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