छत्तीसगढ़ के गौरेला-पेंड्रा-मरवाही में बिहान योजना से जुड़ी महिला स्व-सहायता समूह विष्णु भोग चावल और रंग-बिरंगे धागों से अनोखी राखियां तैयार कर रही हैं। जानिए कैसे यह पहल महिला सशक्तिकरण, ग्रामीण रोजगार और Vocal for Local अभियान को नई दिशा दे रही है।
गौरेला-पेंड्रा-मरवाही CHHATTISHGARH (प्रखर न्यूज 24) । रक्षाबंधन केवल भाई-बहन के अटूट प्रेम और विश्वास का पर्व नहीं है, बल्कि यह भारतीय संस्कृति, परंपरा और सामाजिक मूल्यों का भी प्रतीक है। इस वर्ष छत्तीसगढ़ में यह पर्व एक नई पहचान के साथ मनाया जाएगा। गौरेला-पेंड्रा-मरवाही जिले में बिहान योजना से जुड़ी महिला स्व-सहायता समूहों ने ऐसा नवाचार किया है, जो न केवल त्योहार की खूबसूरती बढ़ा रहा है बल्कि ग्रामीण महिलाओं के जीवन में आर्थिक बदलाव की नई कहानी भी लिख रहा है।
जिले की महिलाओं ने यहां के प्रसिद्ध और सुगंधित विष्णु भोग चावल को रंग-बिरंगे धागों, पारंपरिक डिजाइन और स्थानीय हस्तशिल्प कला के साथ जोड़कर आकर्षक एवं कलात्मक राखियां तैयार की हैं। इन राखियों की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इनमें स्थानीय संस्कृति, कृषि और हस्तकला की झलक साफ दिखाई देती है। यही वजह है कि यह पहल अब ‘वोकल फॉर लोकल’ अभियान की एक प्रेरणादायक मिसाल बनकर सामने आई है।
स्थानीय संसाधनों से तैयार हो रही अनोखी राखियां
गौरेला-पेंड्रा-मरवाही जिला अपनी प्राकृतिक सुंदरता और कृषि उत्पादों के लिए जाना जाता है। यहां उत्पादित विष्णु भोग चावल अपनी अनूठी खुशबू और गुणवत्ता के कारण प्रदेश ही नहीं, बल्कि देश के कई हिस्सों में पसंद किया जाता है।
इसी विशेषता को ध्यान में रखते हुए महिला स्व-सहायता समूहों ने इस चावल को राखी निर्माण में उपयोग करने का अभिनव प्रयोग किया। रंगीन धागों, मोतियों, प्राकृतिक सजावट और विष्णु भोग चावल के दानों से तैयार की गई राखियां देखने में बेहद आकर्षक हैं। इन राखियों में स्थानीय संस्कृति और पारंपरिक कला का सुंदर समावेश दिखाई देता है, जिससे यह सामान्य राखियों से अलग पहचान बना रही हैं।
बिहान योजना से महिलाओं को मिला आत्मनिर्भर बनने का अवसर

राज्य सरकार की बिहान योजना का उद्देश्य ग्रामीण महिलाओं को आर्थिक रूप से मजबूत बनाना और उन्हें स्वरोजगार के अवसर उपलब्ध कराना है। इसी उद्देश्य को आगे बढ़ाते हुए जिले की महिला स्व-सहायता समूहों को राखी निर्माण से जोड़ा गया।
महिलाओं को केवल राखी बनाने तक सीमित नहीं रखा गया, बल्कि उन्हें आधुनिक डिजाइन, बेहतर गुणवत्ता, पैकेजिंग और बाजार की मांग के अनुरूप उत्पाद तैयार करने का भी प्रशिक्षण दिया गया। इससे उनके उत्पादों की गुणवत्ता में सुधार आया है और बाजार में उनकी मांग भी बढ़ने लगी है।
प्रशासन ने दिया विशेष प्रशिक्षण
इस पूरी पहल में जिला प्रशासन की भूमिका भी बेहद महत्वपूर्ण रही है। प्रशासन की ओर से महिलाओं के लिए विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए गए, जिनमें उन्हें आधुनिक राखी निर्माण की तकनीक, गुणवत्ता नियंत्रण, आकर्षक पैकेजिंग और प्रभावी विपणन की जानकारी दी गई।
प्रशिक्षण के दौरान यह भी बताया गया कि ग्राहकों की पसंद और बदलते बाजार के अनुसार उत्पादों को किस प्रकार तैयार किया जाए, ताकि अधिक से अधिक बिक्री हो और महिलाओं की आय में लगातार वृद्धि हो सके।
रेलवे स्टेशन और कलेक्ट्रेट में लगाए जाएंगे विशेष स्टॉल
राखियों की बिक्री को बढ़ावा देने के लिए जिला प्रशासन ने व्यापक योजना तैयार की है। रेलवे स्टेशनों, कलेक्ट्रेट परिसर, ग्राम संगठन कार्यालयों तथा अन्य सार्वजनिक स्थानों पर विशेष विक्रय केंद्र स्थापित किए जा रहे हैं।
इन स्टॉलों के माध्यम से स्थानीय लोगों के साथ-साथ बाहर से आने वाले यात्री भी इन विशेष राखियों को खरीद सकेंगे। इससे महिलाओं को अपने उत्पादों का उचित मूल्य मिलेगा और बिचौलियों पर निर्भरता भी कम होगी।
महिलाओं के लिए अतिरिक्त आय का मजबूत माध्यम
ग्रामीण क्षेत्रों में कई महिलाएं घरेलू जिम्मेदारियों के कारण नियमित रोजगार नहीं कर पातीं। ऐसे में राखी निर्माण उनके लिए घर बैठे आय अर्जित करने का एक बेहतर विकल्प बनकर उभरा है।
त्योहारी सीजन में राखियों की बढ़ती मांग को देखते हुए महिलाओं को अतिरिक्त आमदनी प्राप्त होगी। इससे उनके परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत होगी और वे आत्मनिर्भर बनने की दिशा में एक और मजबूत कदम बढ़ा सकेंगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस मॉडल को लगातार बढ़ावा दिया जाए तो आने वाले वर्षों में यह स्थानीय हस्तशिल्प उद्योग के लिए भी नई संभावनाएं खोल सकता है।
‘वोकल फॉर लोकल’ अभियान को मिल रही नई ताकत
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा शुरू किए गए ‘वोकल फॉर लोकल’ अभियान का उद्देश्य स्थानीय उत्पादों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंचाना है। गौरेला-पेंड्रा-मरवाही की यह पहल इसी सोच को मजबूती प्रदान कर रही है।
स्थानीय स्तर पर उपलब्ध संसाधनों का उपयोग करके तैयार किए गए उत्पाद न केवल रोजगार के अवसर पैदा कर रहे हैं, बल्कि जिले की पहचान भी देशभर में स्थापित कर रहे हैं। विष्णु भोग चावल से बनी ये राखियां आने वाले समय में छत्तीसगढ़ की नई सांस्कृतिक पहचान बन सकती हैं।
विष्णु भोग चावल को मिलेगी नई पहचान
अब तक विष्णु भोग चावल अपनी सुगंध और स्वाद के लिए प्रसिद्ध था, लेकिन अब इसकी पहचान केवल खाद्यान्न तक सीमित नहीं रहेगी। राखी निर्माण में इसके उपयोग से यह एक सांस्कृतिक उत्पाद के रूप में भी पहचान बना रहा है।
यदि इन राखियों को ऑनलाइन प्लेटफॉर्म, मेलों, प्रदर्शनियों और बड़े बाजारों तक पहुंचाया जाए, तो भविष्य में इसकी मांग देश ही नहीं बल्कि विदेशों में भी बढ़ सकती है। इससे जिले के किसानों और महिला समूहों दोनों को प्रत्यक्ष लाभ मिलेगा।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मिलेगा नया आधार
विशेषज्ञों का मानना है कि स्थानीय कृषि उत्पादों को मूल्यवर्धित (Value Added) उत्पादों में बदलना ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। विष्णु भोग चावल से बनी राखियां इसी सोच का बेहतरीन उदाहरण हैं।
इस पहल से महिलाओं की आय बढ़ेगी, स्थानीय उत्पादों की मांग मजबूत होगी और जिले की आर्थिक गतिविधियों को भी नया विस्तार मिलेगा। साथ ही आने वाले समय में दीपावली, नववर्ष और अन्य त्योहारों के लिए भी इसी प्रकार के स्थानीय उत्पाद तैयार किए जा सकते हैं।
रक्षाबंधन के साथ आत्मनिर्भरता का भी उत्सव
इस बार रक्षाबंधन केवल भाई-बहन के प्रेम का पर्व नहीं रहेगा, बल्कि यह ग्रामीण महिलाओं के आत्मविश्वास, मेहनत और आत्मनिर्भरता का भी उत्सव बनेगा। विष्णु भोग चावल से तैयार की गई ये अनोखी राखियां यह संदेश देती हैं कि यदि स्थानीय संसाधनों और पारंपरिक कला को सही दिशा मिले तो वे रोजगार, पहचान और विकास का मजबूत माध्यम बन सकते हैं।
गौरेला-पेंड्रा-मरवाही की यह पहल न केवल छत्तीसगढ़ बल्कि पूरे देश के लिए एक प्रेरणादायक मॉडल बन सकती है। यह साबित करती है कि छोटे-छोटे नवाचार भी बड़े सामाजिक और आर्थिक बदलाव की नींव रख सकते हैं।

