छत्तीसगढ़ के रायगढ़ में एसईसीएल और अदाणी समूह से जुड़ी दो कोयला खनन परियोजनाओं को वन सलाहकार समिति (FAC) ने चरण-1 की सशर्त मंजूरी की सिफारिश की है। करीब 1,000 हेक्टेयर वन भूमि, प्रतिपूरक वनीकरण, पर्यावरणीय शर्तों और स्थानीय प्रभाव से जुड़ी पूरी जानकारी पढ़ें।
छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले में प्रस्तावित दो महत्वपूर्ण कोयला खनन परियोजनाओं को लेकर एक अहम प्रशासनिक प्रगति हुई है। भारत सरकार के पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के अंतर्गत कार्यरत वन सलाहकार समिति (Forest Advisory Committee – FAC) ने लगभग 1,000 हेक्टेयर वन भूमि के उपयोग से जुड़ी दो अलग-अलग कोयला परियोजनाओं को चरण-1 (Stage-I) की सशर्त सैद्धांतिक मंजूरी देने की सिफारिश की है।
इन परियोजनाओं में एक साउथ ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (SECL) की पेलमा ओपनकास्ट कोयला खदान से संबंधित है, जबकि दूसरी परियोजना अदाणी समूह की एक सहायक कंपनी से जुड़ी बताई जा रही है। हालांकि यह मंजूरी अंतिम नहीं है। संबंधित एजेंसियों को कई पर्यावरणीय और वन संरक्षण संबंधी शर्तों का पालन करना होगा, जिसके बाद ही अंतिम यानी चरण-2 (Stage-II) की स्वीकृति पर विचार किया जाएगा।
यह फैसला ऐसे समय आया है जब देश में ऊर्जा सुरक्षा, कोयला उत्पादन और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन को लेकर लगातार बहस जारी है। ऐसे में यह मंजूरी आर्थिक गतिविधियों के साथ-साथ पर्यावरणीय जिम्मेदारियों के दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
क्या है चरण-1 की सशर्त मंजूरी?
वन भूमि पर किसी भी गैर-वानिकी गतिविधि, विशेषकर खनन परियोजना, को शुरू करने से पहले केंद्र सरकार की मंजूरी आवश्यक होती है। यह प्रक्रिया आमतौर पर दो चरणों में पूरी होती है।
पहले चरण में सैद्धांतिक (In-Principle) मंजूरी दी जाती है। इसमें संबंधित परियोजना को कुछ निर्धारित शर्तों के साथ अनुमति की अनुशंसा की जाती है। इन शर्तों में प्रमुख रूप से प्रतिपूरक वनीकरण (Compensatory Afforestation), वन संरक्षण उपाय, पर्यावरणीय प्रबंधन योजना और अन्य कानूनी औपचारिकताएं शामिल होती हैं।
जब परियोजना संचालित करने वाली एजेंसी इन सभी शर्तों का पालन कर लेती है और उसका सत्यापन हो जाता है, तब उसे चरण-2 की अंतिम मंजूरी प्रदान की जाती है। इसके बाद ही वन भूमि का औपचारिक हस्तांतरण और परियोजना का वास्तविक क्रियान्वयन संभव होता है।
करीब 1,000 हेक्टेयर वन भूमि का होगा उपयोग
वन सलाहकार समिति की सिफारिश के अनुसार, दोनों परियोजनाओं के लिए कुल मिलाकर लगभग 1,000 हेक्टेयर वन भूमि के उपयोग का प्रस्ताव है।
पहली परियोजना एसईसीएल की पेलमा ओपनकास्ट खदान से जुड़ी है, जो कोयला उत्पादन बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण मानी जा रही है। दूसरी परियोजना अदाणी समूह की सहायक कंपनी से संबंधित है, जिसका उद्देश्य भी कोयला उत्पादन क्षमता में वृद्धि करना है।
खनन परियोजनाओं के लिए वन भूमि के उपयोग का विषय हमेशा पर्यावरणीय और सामाजिक दृष्टि से संवेदनशील माना जाता है। इसलिए इस तरह की परियोजनाओं में विस्तृत मूल्यांकन और कई स्तरों की स्वीकृति प्रक्रिया अपनाई जाती है।
7 जुलाई की बैठक में हुई थी समीक्षा
जानकारी के अनुसार, वन सलाहकार समिति (FAC) ने 7 जुलाई 2026 को आयोजित अपनी बैठक में दोनों परियोजनाओं पर विस्तार से विचार किया।
बैठक में परियोजनाओं के पर्यावरणीय प्रभाव, वन क्षेत्र पर संभावित असर, प्रतिपूरक वनीकरण की योजना और कानूनी प्रावधानों का परीक्षण किया गया। इसके बाद समिति ने दोनों परियोजनाओं को चरण-1 की सैद्धांतिक मंजूरी देने की अनुशंसा की।
हालांकि समिति ने स्पष्ट किया कि यह स्वीकृति कई शर्तों के अधीन होगी और सभी आवश्यक औपचारिकताओं के पूर्ण होने के बाद ही आगे की प्रक्रिया पूरी की जाएगी।
प्रतिपूरक वनीकरण रहेगा प्रमुख शर्त
समिति द्वारा सुझाई गई प्रमुख शर्तों में प्रतिपूरक वनीकरण सबसे महत्वपूर्ण है।
इस व्यवस्था के तहत जितनी वन भूमि का उपयोग खनन के लिए किया जाएगा, उसके बदले निर्धारित नियमों के अनुसार अन्य उपयुक्त भूमि पर नए जंगल विकसित करने होंगे। इसका उद्देश्य वन क्षेत्र में होने वाले नुकसान की आंशिक भरपाई करना और पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखना है।
इसके अलावा परियोजनाओं को वन्यजीव संरक्षण, जल संरक्षण, मिट्टी संरक्षण, प्रदूषण नियंत्रण और पर्यावरण प्रबंधन से जुड़ी अन्य शर्तों का भी पालन करना होगा।
क्षेत्रीय विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन की चुनौती
रायगढ़ जिला लंबे समय से औद्योगिक और खनन गतिविधियों का प्रमुख केंद्र रहा है। कोयला उत्पादन से राज्य की अर्थव्यवस्था, बिजली उत्पादन और रोजगार पर सकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।
वहीं दूसरी ओर, पर्यावरण विशेषज्ञ लगातार यह भी कहते रहे हैं कि खनन परियोजनाओं का प्रभाव स्थानीय पारिस्थितिकी, जैव विविधता और जल स्रोतों पर पड़ सकता है। इसलिए विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है।
यही कारण है कि केंद्र सरकार द्वारा दी जाने वाली ऐसी मंजूरियों में विस्तृत पर्यावरणीय शर्तें जोड़ी जाती हैं।
अभी अंतिम मंजूरी मिलना बाकी
यह समझना जरूरी है कि अभी परियोजनाओं को केवल चरण-1 की सैद्धांतिक मंजूरी की अनुशंसा मिली है। इसका अर्थ यह नहीं है कि खनन कार्य तत्काल शुरू हो जाएगा।
परियोजना संचालकों को पहले सभी निर्धारित शर्तों का पालन करना होगा। संबंधित विभागों द्वारा सत्यापन और आवश्यक अनुमोदन के बाद ही चरण-2 की अंतिम स्वीकृति जारी की जाएगी।
इसके बाद ही वन भूमि का औपचारिक हस्तांतरण और परियोजना के क्रियान्वयन की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी।
आगे किन बातों पर रहेगी नजर?
अब सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह होगा कि परियोजना संचालित करने वाली एजेंसियां प्रतिपूरक वनीकरण, पर्यावरणीय प्रबंधन और अन्य कानूनी शर्तों का पालन किस प्रकार करती हैं।
साथ ही, स्थानीय समुदायों, पर्यावरणीय प्रभाव, पुनर्वास (यदि लागू हो), जल स्रोतों की सुरक्षा और जैव विविधता संरक्षण जैसे मुद्दे भी आगे की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण रहेंगे।
वन भूमि से जुड़ी किसी भी परियोजना में पारदर्शिता, कानूनी प्रक्रिया का पालन और पर्यावरणीय दायित्वों का प्रभावी क्रियान्वयन ही परियोजना की दीर्घकालिक सफलता सुनिश्चित कर सकता है।
रायगढ़ की इन दो कोयला खनन परियोजनाओं को मिली चरण-1 की सशर्त मंजूरी छत्तीसगढ़ के औद्योगिक विकास के लिए एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक कदम मानी जा रही है। हालांकि यह अंतिम स्वीकृति नहीं है। परियोजनाओं को अभी पर्यावरणीय और वन संरक्षण से जुड़ी सभी अनिवार्य शर्तों को पूरा करना होगा।
आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि विकास, ऊर्जा उत्पादन और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन किस प्रकार स्थापित किया जाता है। यही संतुलन इन परियोजनाओं की स्वीकार्यता और दीर्घकालिक प्रभाव को निर्धारित करेगा।

