रायपुर। लोकतांत्रिक व्यवस्था में विधानसभा केवल कानून बनाने का मंच नहीं होती, बल्कि यह वह सदन है जहां जनता के मुद्दों पर सरकार से जवाबदेही तय की जाती है। प्रश्नकाल इसी जवाबदेही का सबसे प्रभावी माध्यम माना जाता है। छत्तीसगढ़ विधानसभा के फरवरी 2024 से जुलाई 2026 के बीच आयोजित आठ सत्रों के आंकड़े बताते हैं कि इस अवधि में सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ने विभिन्न जनहित के मुद्दों पर सरकार से जवाब मांगे।
आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, इस अवधि में विधानसभा में कुल 12,559 प्रश्न लगाए गए। इनमें विपक्ष के विधायकों ने 7,870 प्रश्न, जबकि सत्ता पक्ष के विधायकों ने 4,689 प्रश्न पूछे। यह आंकड़ा दर्शाता है कि विपक्ष ने अपेक्षाकृत अधिक आक्रामक भूमिका निभाते हुए सरकार को विभिन्न विषयों पर घेरने का प्रयास किया, वहीं सत्ता पक्ष के विधायकों ने भी अपने-अपने क्षेत्रों से जुड़े मुद्दों को सदन में प्रमुखता से उठाया।
प्रश्नकाल क्यों माना जाता है सबसे प्रभावी माध्यम?
भारतीय संसदीय प्रणाली में प्रश्नकाल को सरकार की जवाबदेही सुनिश्चित करने का सबसे सशक्त संसदीय उपकरण माना जाता है। विधायक अपने निर्वाचन क्षेत्र की समस्याओं, विकास कार्यों, योजनाओं के क्रियान्वयन, वित्तीय मामलों, कानून-व्यवस्था, शिक्षा, स्वास्थ्य, सिंचाई, सड़क, बिजली और अन्य जनहित के विषयों पर सरकार से जानकारी मांगते हैं।
सरकार को इन प्रश्नों का तथ्यात्मक और आधिकारिक उत्तर देना होता है। यही कारण है कि किसी विधायक की सक्रियता का आकलन केवल भाषणों से नहीं, बल्कि सदन में पूछे गए प्रश्नों और उठाए गए मुद्दों से भी किया जाता है।
सत्ता पक्ष में सबसे सक्रिय विधायक कौन रहे?
आंकड़ों के अनुसार, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के विधायकों में सबसे अधिक प्रश्न पूछने वालों की सूची में पुन्नूलाल मोहले शीर्ष पर रहे। उन्होंने आठ सत्रों के दौरान 283 प्रश्न लगाए।
उनके बाद धर्मजीत सिंह ने 280 प्रश्न पूछे, जबकि सुशांत शुक्ला ने 271 प्रश्न सदन में लगाए।
इन विधायकों ने अपने-अपने क्षेत्रों से जुड़े विकास कार्यों, प्रशासनिक व्यवस्थाओं और जनहित के विभिन्न विषयों को विधानसभा के माध्यम से सरकार के समक्ष रखा।
कांग्रेस के ये विधायक रहे सबसे सक्रिय
विपक्षी दल कांग्रेस की ओर से भी कई विधायक लगातार सक्रिय नजर आए।
सबसे अधिक प्रश्न पूछने वालों में अंबिका मरकाम और दलेश्वर साहू ने 280-280 प्रश्न लगाए, जबकि बालेश्वर साहू ने 279 प्रश्न पूछे।
ये आंकड़े बताते हैं कि विपक्ष ने सरकार की नीतियों, योजनाओं और प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर लगातार सवाल उठाकर सदन में अपनी सक्रिय भूमिका निभाई।
नेता प्रतिपक्ष चरणदास महंत की सक्रियता
नेता प्रतिपक्ष डॉ. चरणदास महंत ने भी विधानसभा में उल्लेखनीय सक्रियता दिखाई। उन्होंने आठ सत्रों के दौरान 276 प्रश्न लगाए।
इसी अवधि में विधायक शेषराज हरवंश ने 272 प्रश्न पूछे, जो उन्हें सक्रिय विधायकों की सूची में प्रमुख स्थान दिलाते हैं।
पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने पूछे 89 प्रश्न
आंकड़ों के अनुसार, पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने फरवरी 2024 से जुलाई 2026 के बीच आयोजित आठ सत्रों में 89 प्रश्न पूछे।
हालांकि प्रश्नों की संख्या अन्य कई विधायकों की तुलना में कम रही, लेकिन उन्होंने विभिन्न विषयों पर सरकार से जवाब मांगा और सदन में अपनी भूमिका निभाई।
यह ध्यान देने योग्य है कि किसी विधायक की सक्रियता का मूल्यांकन केवल प्रश्नों की संख्या से नहीं, बल्कि उठाए गए मुद्दों की प्रकृति, बहसों में भागीदारी, ध्यानाकर्षण प्रस्ताव, स्थगन प्रस्ताव और समितियों में योगदान जैसे अन्य संसदीय कार्यों से भी किया जाता है।
विधानसभा नियमावली में क्या है प्रश्न पूछने का प्रावधान?
छत्तीसगढ़ विधानसभा की नियमावली के अनुसार, किसी भी सदस्य के एक बैठक दिवस में अधिकतम चार प्रश्न ही स्वीकार किए जाते हैं।
इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि अधिक से अधिक विधायकों को अपने क्षेत्रों के मुद्दे सदन में उठाने का अवसर मिल सके।
इसी नियम के तहत प्रत्येक सत्र में प्रश्नों की अधिकतम संख्या बैठकों की संख्या पर निर्भर करती है।
मानसून सत्र में 36 विधायकों ने पूछा अधिकतम 20-20 प्रश्न
हालिया मानसून सत्र में विधानसभा की पांच बैठकें आयोजित की गईं। नियमों के अनुसार प्रत्येक विधायक अधिकतम 20 प्रश्न (प्रति बैठक चार प्रश्न) ही सूचीबद्ध करा सकता था।
आंकड़ों के मुताबिक, इस सत्र में 36 विधायकों ने इस अधिकतम सीमा का पूरा उपयोग करते हुए 20-20 प्रश्न लगाए।
यह दर्शाता है कि कई विधायक अपने-अपने क्षेत्रों से जुड़े मुद्दों को सदन में रखने के लिए लगातार सक्रिय रहे।
सवालों के जरिए सामने आते हैं जनहित के मुद्दे
विधानसभा में पूछे जाने वाले प्रश्न केवल राजनीतिक बहस का हिस्सा नहीं होते, बल्कि इनके माध्यम से कई महत्वपूर्ण प्रशासनिक और विकासात्मक मुद्दे सार्वजनिक होते हैं।
कई बार सड़क, बिजली, पानी, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं, कृषि, सिंचाई, वन अधिकार, रोजगार, कानून-व्यवस्था और सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन से जुड़ी समस्याएं प्रश्नकाल के माध्यम से उजागर होती हैं। इसके बाद संबंधित विभागों को जवाब देना पड़ता है और कई मामलों में सुधारात्मक कार्रवाई भी होती है।
लोकतंत्र में सक्रिय जनप्रतिनिधियों की भूमिका
विशेषज्ञों का मानना है कि विधानसभा में प्रश्न पूछना केवल औपचारिक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह लोकतंत्र की जवाबदेही प्रणाली का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
जब जनप्रतिनिधि नियमित रूप से अपने निर्वाचन क्षेत्रों से जुड़े मुद्दे सदन में उठाते हैं, तो इससे सरकार तक स्थानीय समस्याएं पहुंचती हैं और उनके समाधान की दिशा में प्रशासनिक प्रक्रिया आगे बढ़ती है।
हालांकि किसी विधायक की प्रभावशीलता का मूल्यांकन केवल प्रश्नों की संख्या से नहीं किया जा सकता। सदन में बहस, विधेयकों पर चर्चा, समितियों में योगदान, स्थानीय विकास कार्यों की निगरानी और जनता के साथ संवाद भी उतने ही महत्वपूर्ण पहलू हैं।
आंकड़े क्या संकेत देते हैं?
फरवरी 2024 से जुलाई 2026 तक के विधानसभा रिकॉर्ड यह संकेत देते हैं कि सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ने अपने-अपने स्तर पर सदन में सक्रिय भूमिका निभाई।
जहां विपक्ष ने अधिक संख्या में प्रश्न पूछकर सरकार से जवाबदेही सुनिश्चित करने का प्रयास किया, वहीं सत्ता पक्ष के कई विधायकों ने भी अपने क्षेत्रों से जुड़े मुद्दों को प्रभावी ढंग से विधानसभा में उठाया।
आने वाले विधानसभा सत्रों में भी यह देखना दिलचस्प होगा कि जनप्रतिनिधि प्रश्नकाल और अन्य संसदीय प्रक्रियाओं के माध्यम से जनता के मुद्दों को किस तरह सदन में प्रमुखता से उठाते हैं।

