कोरबा में है एक ऐसा गांव जहां, दूल्हा-दुल्हन सहित पूरी बारात बन गई थी पत्थरों की , गांव वाले आज भी किसी अच्छे कार्य से पहले करते हैं उनकी पूजा, ग्रामीणों की मान्यता है कि वर्षों पहले यहां से गुजर रहे बारातियों समेत दूल्हा-दुल्हन का पूरा परिवार पत्थरों में बदल गया. कारण कोई नहीं जानता, लेकिन कहा जाता है कि तभी से इस गांव में होने वाली शादियों में दुल्हन को पौ फटने यानि सूरज उगने से पहले ही विदा कर दिया जाता है.
Pews24-कोरबा-चांपा मार्ग पर स्थित बरपाली के आश्रित ग्राम डोंगरीभाठा में पिछले 100 साल से एक अनोखी परंपरा निभाई जा रही है. ग्रामीणों की मान्यता है कि वर्षों पहले यहां से गुजर रहे बारातियों समेत दूल्हा-दुल्हन का पूरा परिवार पत्थरों में बदल गया, कहा जाता है कि तभी से इस गांव में होने वाली शादियों में दुल्हन को पौ फटने से पहले ही विदा कर दिया जाता है. इस डर से कि कहीं सभी पत्थर न बन जाएं
आमतौर पर देखा जाता है कि ग्रामीण अंचलों में गांव में प्रवेश द्वार के पास ठाकुर देवता की पूजा ग्रामीणों द्वारा की जाती है, लेकिन करतला विकासखंड के ग्राम डोंगरीभाठा में स्थिति कुछ अलग है. यहां भी ठाकुर देवता तो विराजमान है लेकिन गांव के लोग उनसे पहले दूल्हा-दुल्हन का रूप कहे जाने कुछ शिलाओं को पूजते है. ग्रामीणों का कहना है कि करीब 100 साल पहले जब डोंगरीभाठा महज एक टोला था और कुछ परिवार ही यहां रहा करते थे, तब एक अनोखी घटना घटित हुई थी
गांव के बैगा(पुजारी) 70 वर्षीय टिकैत राम ने बताया कि यहां मांगी गई हर मन्नत पूरी होती है. हर तीन साल में यहां धूम-धाम से त्रिशाला पूजा की जाती है. प्रथम पूज्य ठाकुर देव होते है, जिनकी महिमा अपरंपार है लेकिन बुजुर्गों के बताए नियम पर सबसे पहले दूल्हा-दुल्हन और बारातियों की पूजा होती है और उसके बाद ठाकुर देवता की. बैगा के अनुसार शादी से पहले लड़का हो या लड़की, दोनों ही यहां आकर नारियल फोड़ते है ताकि विवाह संस्कार में कोई बाधा न हो . यह नियम गांव के प्रत्येक निवासी के लिए अनिवार्य है, जिसका आज भी पूरी श्रद्धा से पालन किया जाता है lगांव के बुजुर्ग महिला ने बताया कि बाराती और दूल्हा-दुल्हन लंबे सफर से थककर यहां आराम करने बैठे और खाना खाकर बातें करने लगे. इस दौरान समय का पता ही नहीं चला और सुबह हो गई. सूरज की पहली किरण के साथ सभी पत्थर बन गए. तब डोंगरीभाठा में ज्यादा लोग नहीं थे और पत्थर बने बाराती और दूल्हा-दुल्हन भी कुछ एक बित्ते भर की लंबाई के थे . धीरे-धीरे 100 साल गुजर गए और सभी बढ़ते-बढ़ते आज तीन गुना आकार के हो गए है. टिकैतराम ने बताया कि पूरा गांव इस मान्यता का अनुशरण करता है और इतना ही नहीं, कभी भी गांव में कभी कोई बीमारी और संकट आने वाला होता है तो पहले ही पता चल जाता है. गांव में वर्षों से ऐसी मान्यता चली आ रही है, लोग श्रद्धा के साथ पत्थर में तब्दील दूल्हा-दुल्हन व बारातियों की पूजा-अर्चना कर खुशहाली का आशीर्वाद मांगते है. मान्यता 100 सालों से इस परंपरा का निर्वहन लोग आज भी कर रहे हैं। सुबह होने से पहले अगर बेटी विदा कर दी गई तो ठीक बारात पर सूरज की किरण पड़ी तो सभी पत्थर में तब्दील हो जाएंगे। ऐसी मान्यता गांव में आज भी कायम है।बारातियों के पत्थर बन जाने वाली मान्यता पर विश्वास करना कठिन है। अब इसके पीछे का सच क्या है और इस रहस्यमयी कहानी की शुरुआत कहां से हुई। यह किसी को नहीं पता,लेकिन वर्तमान परिवेश में गांव में इस कहानी को लोग सच मानते हैं।वह बेटी को दिन में विदा कर कोई रिस्क नहीं लेना चाहते।
ग्रामीणों की आस्था
गांव के प्रारंभ में ही एक स्थान है, जहां कतार से पत्थरों की मौजूदगी है। इन्हें दूल्हा-दुल्हन के तौर पर पूजा जाता है। यहां मौजूद मुख्य पत्थरों को दूल्हा-दुल्हन और बाकी पत्थरों को बाराती की संज्ञा दी गई है। कहा जाता है कि यह पत्थर कभी चलते-फिरते मानव थे। दूल्हा दुल्हन सहित पूरी बारात यहां से गुजर रही थी। एक अच्छा स्थान देखकर रात्रि विश्राम के लिए अपना ठहराव बनाया। रात को सभी ने यहां भोजन भी किया, लेकिन जैसे ही सुबह हुई, सूर्य की पहली किरण पड़ते ही वह सभी पत्थर के बन गए।गांव में मान्यता है कि एक गलती की वजह से वह सभी पत्थर में तब्दील हो गए।

