जांजगीर-चांपा के शासकीय स्कूल में ‘तंत्र-मंत्र’ का विवाद: सोने की बाली गुम होने पर बच्चों के सामने लाल कपड़े, नारियल और अक्षत के साथ पहुंचीं शिक्षिका, शिक्षा विभाग ने जारी किया नोटिस

जांजगीर-चांपा के काठापाली शासकीय विद्यालय में शिक्षिका द्वारा सोने की बाली गुम होने के बाद बच्चों के सामने कथित तंत्र-मंत्र जैसी गतिविधि करने का मामला सामने आया है। अभिभावकों की शिकायत पर शिक्षा विभाग ने कारण बताओ नोटिस जारी किया। पढ़िए पूरी विस्तृत रिपोर्ट।

जांजगीर-चांपा CHHATTISHGARH (प्रखर न्यूज 24) छत्तीसगढ़ के जांजगीर-चांपा जिले के बलौदा विकासखंड अंतर्गत ग्राम काठापाली स्थित शासकीय प्राथमिक एवं माध्यमिक विद्यालय से एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने शिक्षा व्यवस्था और विद्यालयों में बच्चों के मानसिक वातावरण को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। यहां एक शिक्षिका द्वारा अपनी गुम हुई सोने की बाली तलाशने के लिए कथित तौर पर बच्चों के सामने तंत्र-मंत्र जैसी गतिविधि करने का आरोप लगा है। इस घटना के बाद स्कूल के कई छात्र-छात्राएं भयभीत हो गए, जबकि अभिभावकों ने मामले पर कड़ी आपत्ति जताते हुए शिक्षा विभाग से शिकायत की।

शिकायत मिलने के बाद जिला शिक्षा विभाग ने पूरे मामले को गंभीरता से लेते हुए संबंधित शिक्षिका को कारण बताओ (Show Cause) नोटिस जारी कर स्पष्टीकरण मांगा है। विभाग का कहना है कि जांच के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी।

क्या है पूरा मामला?

जानकारी के अनुसार, ग्राम काठापाली के शासकीय प्राथमिक एवं माध्यमिक विद्यालय में पदस्थ शिक्षिका गीता कुम्भकार की सोने की बाली विद्यालय परिसर में कहीं गुम हो गई थी। बताया जा रहा है कि बाली की काफी देर तक तलाश की गई, लेकिन जब वह नहीं मिली तो शिक्षिका ने एक ऐसा कदम उठाया, जिसने पूरे विद्यालय का माहौल बदल दिया।

प्रत्यक्षदर्शियों और अभिभावकों के अनुसार, शिक्षिका लाल रंग के कपड़े में नारियल और अक्षत (चावल) लेकर बच्चों के बीच पहुंचीं। इसके बाद उन्होंने बच्चों के सामने ऐसी गतिविधियां कीं, जिन्हें वहां मौजूद लोगों ने तंत्र-मंत्र जैसी प्रक्रिया बताया।

बताया जाता है कि इस दौरान बच्चों से कहा गया कि यदि किसी ने बाली ली है तो वह उसे तुरंत वापस कर दे, अन्यथा उसे गंभीर परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं।

बच्चों के मन में बैठ गया डर

विद्यालय में हुई इस घटना का सबसे अधिक असर छोटे बच्चों पर पड़ा। कई विद्यार्थियों ने घर जाकर अपने माता-पिता को पूरी घटना बताई। बच्चों के अनुसार, शिक्षिका की बातों और माहौल के कारण वे डर गए थे। कुछ बच्चों ने यह भी कहा कि उन्हें लगा कि यदि किसी पर शक हुआ तो उसके साथ कुछ अनहोनी हो सकती है।

बाल मनोविज्ञान के जानकारों का मानना है कि विद्यालय बच्चों के लिए सुरक्षित और वैज्ञानिक सोच विकसित करने का स्थान होता है। ऐसे माहौल में अंधविश्वास या भय पैदा करने वाली किसी भी गतिविधि का बच्चों के मानसिक विकास पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।

अभिभावकों ने जताई नाराजगी

घटना की जानकारी मिलते ही कई अभिभावक विद्यालय पहुंचे और शिक्षिका के व्यवहार पर आपत्ति जताई। उनका कहना था कि यदि कोई सामान गुम होता है तो उसकी जांच प्रशासनिक और सामान्य तरीके से होनी चाहिए, न कि बच्चों के सामने डर और अंधविश्वास का माहौल बनाकर।

अभिभावकों ने शिक्षा विभाग से मांग की कि विद्यालय में बच्चों के साथ ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो और दोषी पाए जाने पर उचित कार्रवाई की जाए।

एक अभिभावक ने कहा कि विद्यालय शिक्षा का मंदिर है, जहां बच्चों को वैज्ञानिक सोच, नैतिकता और संवैधानिक मूल्यों की शिक्षा दी जानी चाहिए। यदि शिक्षक ही इस प्रकार का व्यवहार करेंगे तो बच्चों के मन पर गलत प्रभाव पड़ सकता है।

शिक्षा विभाग ने लिया संज्ञान

मामले की शिकायत मिलने के बाद जिला शिक्षा अधिकारी (डीईओ) कार्यालय ने प्राथमिक स्तर पर जानकारी जुटाई। प्रारंभिक जांच में घटना की पुष्टि होने के बाद संबंधित शिक्षिका गीता कुम्भकार को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया है।

विभाग ने शिक्षिका से पूछा है कि उन्होंने विद्यालय परिसर में इस प्रकार की गतिविधि क्यों की और बच्चों के सामने ऐसा वातावरण क्यों बनाया गया। निर्धारित समय सीमा में जवाब प्रस्तुत करने के निर्देश दिए गए हैं।

शिक्षा विभाग के अधिकारियों का कहना है कि यदि जांच में आरोप सही पाए जाते हैं तो सेवा नियमों के तहत आगे की आवश्यक कार्रवाई की जाएगी।

विद्यालयों में वैज्ञानिक सोच विकसित करने की जिम्मेदारी

नई शिक्षा नीति सहित विभिन्न शैक्षणिक कार्यक्रमों में विद्यार्थियों के भीतर वैज्ञानिक दृष्टिकोण, तार्किक सोच और संवैधानिक मूल्यों को विकसित करने पर विशेष जोर दिया जाता है। ऐसे में यदि किसी शैक्षणिक संस्थान में अंधविश्वास से जुड़ी गतिविधियों के आरोप सामने आते हैं, तो यह केवल अनुशासन का नहीं बल्कि शिक्षा के उद्देश्य का भी विषय बन जाता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि शिक्षक समाज में आदर्श की भूमिका निभाते हैं। उनकी प्रत्येक गतिविधि का सीधा प्रभाव बच्चों की सोच और व्यक्तित्व पर पड़ता है। इसलिए विद्यालयों में किसी भी प्रकार के भय, अंधविश्वास या मनोवैज्ञानिक दबाव से बचना आवश्यक है।

जांच के बाद होगी आगे की कार्रवाई

फिलहाल शिक्षा विभाग पूरे मामले की विस्तृत जांच कर रहा है। विभाग का कहना है कि शिक्षिका का पक्ष भी सुना जाएगा और सभी तथ्यों के आधार पर निष्पक्ष निर्णय लिया जाएगा। वहीं, अभिभावकों की नजर अब इस बात पर है कि विभाग इस मामले में क्या अंतिम कार्रवाई करता है।

इस घटना ने एक बार फिर यह बहस छेड़ दी है कि विद्यालयों में बच्चों के साथ व्यवहार करते समय शिक्षकों को न केवल सेवा नियमों का पालन करना चाहिए, बल्कि ऐसी किसी भी गतिविधि से बचना चाहिए जिससे विद्यार्थियों के मन में भय या भ्रम पैदा हो।

 

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