वनमंत्री केदार कश्यप ने कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष दीपक बैज के बयान पर तीखा पलटवार करते हुए कहा कि बस्तर पंडुम आदिवासी संस्कृति और गौरव का प्रतीक है। जानिए राष्ट्रपति भवन में बस्तर के प्रतिनिधियों के सम्मान, आदिवासी अस्मिता और कांग्रेस पर लगाए गए आरोपों की पूरी खबर।
रायपुर CHHATTISHGARH (प्रखर न्यूज 24) । छत्तीसगढ़ की राजनीति में एक बार फिर आदिवासी अस्मिता और बस्तर की सांस्कृतिक पहचान को लेकर बयानबाजी तेज हो गई है। वनमंत्री केदार कश्यप ने कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष दीपक बैज के उस बयान पर कड़ा पलटवार किया है, जिसमें उन्होंने बस्तर पंडुम और राष्ट्रपति भवन में बस्तर के आदिवासी प्रतिनिधियों की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से हुई मुलाकात को लेकर सवाल उठाए थे। कश्यप ने इसे केवल राजनीतिक टिप्पणी नहीं, बल्कि पूरे जनजातीय समाज की संस्कृति, परंपरा और सम्मान का अपमान बताया।
वनमंत्री ने कहा कि बस्तर पंडुम किसी राजनीतिक दल का आयोजन नहीं है, बल्कि यह सदियों से चली आ रही बस्तर की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, लोक परंपराओं और जनजातीय गौरव का महापर्व है। इस आयोजन ने पहली बार बस्तर के लोक कलाकारों, मांझी-चालकी जैसी पारंपरिक व्यवस्थाओं और आदिवासी संस्कृति को राष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान दिलाई है। ऐसे आयोजन पर सवाल उठाना यह दर्शाता है कि कांग्रेस आज भी आदिवासी समाज के सम्मान को राजनीतिक नजरिए से देख रही है।
बस्तर पंडुम को बताया जनजातीय गौरव का प्रतीक
केदार कश्यप ने कहा कि बस्तर पंडुम केवल सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि आदिवासी समाज की पहचान, परंपरा और सामाजिक व्यवस्था का जीवंत स्वरूप है। इस आयोजन के माध्यम से बस्तर की समृद्ध लोक संस्कृति को राष्ट्रीय मंच मिला है और देशभर के लोगों ने आदिवासी जीवनशैली, लोकनृत्य, संगीत और पारंपरिक व्यवस्थाओं को करीब से जाना।
उन्होंने कहा कि जब राष्ट्रपति भवन में बस्तर के कलाकारों और प्रतिनिधियों को सम्मान मिला, तब यह पूरे छत्तीसगढ़ और विशेष रूप से आदिवासी समाज के लिए गर्व का विषय था। ऐसे अवसरों को राजनीतिक विवाद में बदलना दुर्भाग्यपूर्ण है।
कांग्रेस से पूछे कई सवाल
वनमंत्री ने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा कि प्रदेश में लंबे समय तक सत्ता में रहने के बावजूद कांग्रेस यह बताए कि उसने बस्तर की संस्कृति और लोक कलाकारों को राष्ट्रीय पहचान दिलाने के लिए कौन-सा ऐतिहासिक कार्य किया।
उन्होंने कहा कि वर्षों तक शासन करने वाली कांग्रेस सरकारों के दौरान बस्तर की चर्चा विकास, पर्यटन या संस्कृति के लिए कम और नक्सली हिंसा, भय तथा पिछड़ेपन के कारण अधिक होती थी। आज जब राज्य सरकार आदिवासी संस्कृति को देश-दुनिया तक पहुंचाने का प्रयास कर रही है, तब कांग्रेस को इसमें भी राजनीति दिखाई दे रही है।
राष्ट्रपति भवन तक पहुंची बस्तर की सांस्कृतिक पहचान
कश्यप ने कहा कि राष्ट्रपति भवन में बस्तर के प्रतिनिधियों का सम्मान केवल एक औपचारिक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि यह देश की सर्वोच्च संवैधानिक संस्था द्वारा आदिवासी संस्कृति को दिए गए सम्मान का प्रतीक है।
उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू स्वयं आदिवासी समाज से आती हैं और उन्होंने देशभर की जनजातीय परंपराओं को नई पहचान दिलाने का लगातार प्रयास किया है। ऐसे में बस्तर के कलाकारों और पारंपरिक प्रतिनिधियों का राष्ट्रपति भवन पहुंचना पूरे प्रदेश के लिए गौरव की बात है।
“आदिवासी समाज को राजनीतिक चश्मे से देखना बंद करे कांग्रेस”
वनमंत्री ने कहा कि आदिवासी समाज किसी राजनीतिक दल की जागीर नहीं है। यह समाज अपनी समृद्ध परंपराओं, सांस्कृतिक विरासत और सामाजिक मूल्यों के कारण पूरे देश में अलग पहचान रखता है। यदि किसी आयोजन से आदिवासी समाज का सम्मान बढ़ता है तो उसका स्वागत होना चाहिए, न कि उस पर अनावश्यक विवाद खड़ा किया जाना चाहिए।
उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस हर सकारात्मक पहल को राजनीतिक रंग देकर उसका महत्व कम करने का प्रयास कर रही है। लेकिन प्रदेश की जनता और विशेष रूप से बस्तर के लोग यह समझते हैं कि उनकी संस्कृति और पहचान का सम्मान किस सरकार ने बढ़ाया है।
संस्कृति संरक्षण को सरकार की प्राथमिकता बताया
केदार कश्यप ने कहा कि राज्य सरकार जनजातीय संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन के लिए लगातार कार्य कर रही है। बस्तर की लोककलाओं, पारंपरिक रीति-रिवाजों, देवी-देवताओं से जुड़े आयोजनों और स्थानीय कलाकारों को राष्ट्रीय मंच उपलब्ध कराने के लिए कई योजनाओं पर काम किया जा रहा है।
उन्होंने कहा कि सरकार का उद्देश्य केवल सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित करना नहीं, बल्कि नई पीढ़ी को अपनी परंपराओं से जोड़ना भी है, ताकि आने वाले वर्षों में बस्तर की सांस्कृतिक धरोहर और अधिक मजबूत हो सके।
राजनीतिक बयानबाजी के बीच आदिवासी सम्मान बना केंद्र
छत्तीसगढ़ की राजनीति में आदिवासी मुद्दे हमेशा महत्वपूर्ण रहे हैं। बस्तर जैसे जनजातीय बहुल क्षेत्र में सांस्कृतिक पहचान और सामाजिक परंपराएं चुनावी विमर्श का भी अहम हिस्सा बनती रही हैं। ऐसे में बस्तर पंडुम और राष्ट्रपति भवन में हुए सम्मान को लेकर कांग्रेस और भाजपा के बीच आरोप-प्रत्यारोप तेज हो गए हैं।
हालांकि राजनीतिक दलों के अपने-अपने तर्क हैं, लेकिन इस पूरे विवाद ने एक बार फिर आदिवासी संस्कृति, उसकी पहचान और उसके संरक्षण को सार्वजनिक चर्चा के केंद्र में ला दिया है।
आगे क्या?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले समय में इस मुद्दे पर दोनों प्रमुख दलों के बीच बयानबाजी और तेज हो सकती है। वहीं, बस्तर के सांस्कृतिक आयोजनों और आदिवासी समाज से जुड़े विषय प्रदेश की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहेंगे।
फिलहाल वनमंत्री केदार कश्यप ने साफ शब्दों में कहा है कि बस्तर पंडुम पर सवाल उठाना केवल एक आयोजन की आलोचना नहीं, बल्कि आदिवासी समाज के सम्मान और उसकी सांस्कृतिक विरासत को कमतर आंकने जैसा है। उन्होंने कांग्रेस से आग्रह किया कि वह राजनीतिक मतभेदों से ऊपर उठकर जनजातीय समाज की परंपराओं और गौरव का सम्मान करे।
रायपुर। छत्तीसगढ़ की राजनीति में एक बार फिर आदिवासी अस्मिता और बस्तर की सांस्कृतिक पहचान को लेकर बयानबाजी तेज हो गई है। वनमंत्री केदार कश्यप ने कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष दीपक बैज के उस बयान पर कड़ा पलटवार किया है, जिसमें उन्होंने बस्तर पंडुम और राष्ट्रपति भवन में बस्तर के आदिवासी प्रतिनिधियों की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से हुई मुलाकात को लेकर सवाल उठाए थे। कश्यप ने इसे केवल राजनीतिक टिप्पणी नहीं, बल्कि पूरे जनजातीय समाज की संस्कृति, परंपरा और सम्मान का अपमान बताया।
वनमंत्री ने कहा कि बस्तर पंडुम किसी राजनीतिक दल का आयोजन नहीं है, बल्कि यह सदियों से चली आ रही बस्तर की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, लोक परंपराओं और जनजातीय गौरव का महापर्व है। इस आयोजन ने पहली बार बस्तर के लोक कलाकारों, मांझी-चालकी जैसी पारंपरिक व्यवस्थाओं और आदिवासी संस्कृति को राष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान दिलाई है। ऐसे आयोजन पर सवाल उठाना यह दर्शाता है कि कांग्रेस आज भी आदिवासी समाज के सम्मान को राजनीतिक नजरिए से देख रही है।
बस्तर पंडुम को बताया जनजातीय गौरव का प्रतीक
केदार कश्यप ने कहा कि बस्तर पंडुम केवल सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि आदिवासी समाज की पहचान, परंपरा और सामाजिक व्यवस्था का जीवंत स्वरूप है। इस आयोजन के माध्यम से बस्तर की समृद्ध लोक संस्कृति को राष्ट्रीय मंच मिला है और देशभर के लोगों ने आदिवासी जीवनशैली, लोकनृत्य, संगीत और पारंपरिक व्यवस्थाओं को करीब से जाना।
उन्होंने कहा कि जब राष्ट्रपति भवन में बस्तर के कलाकारों और प्रतिनिधियों को सम्मान मिला, तब यह पूरे छत्तीसगढ़ और विशेष रूप से आदिवासी समाज के लिए गर्व का विषय था। ऐसे अवसरों को राजनीतिक विवाद में बदलना दुर्भाग्यपूर्ण है।
कांग्रेस से पूछे कई सवाल
वनमंत्री ने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा कि प्रदेश में लंबे समय तक सत्ता में रहने के बावजूद कांग्रेस यह बताए कि उसने बस्तर की संस्कृति और लोक कलाकारों को राष्ट्रीय पहचान दिलाने के लिए कौन-सा ऐतिहासिक कार्य किया।
उन्होंने कहा कि वर्षों तक शासन करने वाली कांग्रेस सरकारों के दौरान बस्तर की चर्चा विकास, पर्यटन या संस्कृति के लिए कम और नक्सली हिंसा, भय तथा पिछड़ेपन के कारण अधिक होती थी। आज जब राज्य सरकार आदिवासी संस्कृति को देश-दुनिया तक पहुंचाने का प्रयास कर रही है, तब कांग्रेस को इसमें भी राजनीति दिखाई दे रही है।
राष्ट्रपति भवन तक पहुंची बस्तर की सांस्कृतिक पहचान
कश्यप ने कहा कि राष्ट्रपति भवन में बस्तर के प्रतिनिधियों का सम्मान केवल एक औपचारिक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि यह देश की सर्वोच्च संवैधानिक संस्था द्वारा आदिवासी संस्कृति को दिए गए सम्मान का प्रतीक है।
उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू स्वयं आदिवासी समाज से आती हैं और उन्होंने देशभर की जनजातीय परंपराओं को नई पहचान दिलाने का लगातार प्रयास किया है। ऐसे में बस्तर के कलाकारों और पारंपरिक प्रतिनिधियों का राष्ट्रपति भवन पहुंचना पूरे प्रदेश के लिए गौरव की बात है।
“आदिवासी समाज को राजनीतिक चश्मे से देखना बंद करे कांग्रेस”
वनमंत्री ने कहा कि आदिवासी समाज किसी राजनीतिक दल की जागीर नहीं है। यह समाज अपनी समृद्ध परंपराओं, सांस्कृतिक विरासत और सामाजिक मूल्यों के कारण पूरे देश में अलग पहचान रखता है। यदि किसी आयोजन से आदिवासी समाज का सम्मान बढ़ता है तो उसका स्वागत होना चाहिए, न कि उस पर अनावश्यक विवाद खड़ा किया जाना चाहिए।
उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस हर सकारात्मक पहल को राजनीतिक रंग देकर उसका महत्व कम करने का प्रयास कर रही है। लेकिन प्रदेश की जनता और विशेष रूप से बस्तर के लोग यह समझते हैं कि उनकी संस्कृति और पहचान का सम्मान किस सरकार ने बढ़ाया है।
संस्कृति संरक्षण को सरकार की प्राथमिकता बताया
केदार कश्यप ने कहा कि राज्य सरकार जनजातीय संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन के लिए लगातार कार्य कर रही है। बस्तर की लोककलाओं, पारंपरिक रीति-रिवाजों, देवी-देवताओं से जुड़े आयोजनों और स्थानीय कलाकारों को राष्ट्रीय मंच उपलब्ध कराने के लिए कई योजनाओं पर काम किया जा रहा है।
उन्होंने कहा कि सरकार का उद्देश्य केवल सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित करना नहीं, बल्कि नई पीढ़ी को अपनी परंपराओं से जोड़ना भी है, ताकि आने वाले वर्षों में बस्तर की सांस्कृतिक धरोहर और अधिक मजबूत हो सके।
राजनीतिक बयानबाजी के बीच आदिवासी सम्मान बना केंद्र
छत्तीसगढ़ की राजनीति में आदिवासी मुद्दे हमेशा महत्वपूर्ण रहे हैं। बस्तर जैसे जनजातीय बहुल क्षेत्र में सांस्कृतिक पहचान और सामाजिक परंपराएं चुनावी विमर्श का भी अहम हिस्सा बनती रही हैं। ऐसे में बस्तर पंडुम और राष्ट्रपति भवन में हुए सम्मान को लेकर कांग्रेस और भाजपा के बीच आरोप-प्रत्यारोप तेज हो गए हैं।
हालांकि राजनीतिक दलों के अपने-अपने तर्क हैं, लेकिन इस पूरे विवाद ने एक बार फिर आदिवासी संस्कृति, उसकी पहचान और उसके संरक्षण को सार्वजनिक चर्चा के केंद्र में ला दिया है।
आगे क्या?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले समय में इस मुद्दे पर दोनों प्रमुख दलों के बीच बयानबाजी और तेज हो सकती है। वहीं, बस्तर के सांस्कृतिक आयोजनों और आदिवासी समाज से जुड़े विषय प्रदेश की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहेंगे।
फिलहाल वनमंत्री केदार कश्यप ने साफ शब्दों में कहा है कि बस्तर पंडुम पर सवाल उठाना केवल एक आयोजन की आलोचना नहीं, बल्कि आदिवासी समाज के सम्मान और उसकी सांस्कृतिक विरासत को कमतर आंकने जैसा है। उन्होंने कांग्रेस से आग्रह किया कि वह राजनीतिक मतभेदों से ऊपर उठकर जनजातीय समाज की परंपराओं और गौरव का सम्मान करे।

